
लखनऊ। शिक्षा केवल पुस्तकों और परीक्षाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका वास्तविक उद्देश्य ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना है जो बौद्धिक रूप से सक्षम होने के साथ-साथ भावनात्मक, शारीरिक और सामाजिक रूप से भी संतुलित हो। इसी विचार को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है सिटी इंटरनेशनल स्कूल, बालागंज की प्रधानाचार्या एवं वरिष्ठ शिक्षाविद् डॉ. रागिनी गुलाटी ने, जिनके विचार प्रतिष्ठित राष्ट्रीय दैनिक हिन्दुस्तान टाइम्स के शिक्षा विशेषांक ‘Beyond Books’ में प्रमुखता से प्रकाशित हुए हैं।
इस विशेष संवाद में डॉ. गुलाटी ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था के वर्तमान और भविष्य पर अपने दृष्टिकोण को साझा करते हुए कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 शिक्षा जगत में एक दूरगामी परिवर्तन लेकर आई है। उनके अनुसार, यह नीति विद्यार्थियों को केवल निर्धारित विषयों तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन्हें अपनी रुचि, क्षमता और रचनात्मक सोच के अनुरूप सीखने और आगे बढ़ने की स्वतंत्रता प्रदान करती है। बहुविषयक शिक्षा और विषय चयन में लचीलापन विद्यार्थियों में नवाचार, जिज्ञासा और आत्मविश्वास को प्रोत्साहित करता है।
उन्होंने वर्तमान पीढ़ी के विद्यार्थियों को तकनीकी रूप से दक्ष, जागरूक और वैश्विक सोच रखने वाला बताया। डॉ. गुलाटी का मानना है कि आज के विद्यार्थी नए विचारों को अपनाने, प्रश्न पूछने और अपनी अलग पहचान बनाने का साहस रखते हैं। डिजिटल माध्यमों ने उनके ज्ञान का दायरा बढ़ाया है और उनमें रचनात्मकता तथा उद्यमिता की भावना को मजबूत किया है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल युग ने कुछ चुनौतियाँ भी प्रस्तुत की हैं, जिनमें घटती एकाग्रता और आमने-सामने संवाद की कमी प्रमुख हैं। ऐसे में शिक्षकों और अभिभावकों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, ताकि तकनीक को सीखने और व्यक्तित्व निर्माण का सकारात्मक माध्यम बनाया जा सके।
डॉ. गुलाटी ने इस बात पर विशेष बल दिया कि आधुनिक कक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान देने का स्थान नहीं होनी चाहिए, बल्कि वह ज्ञान और वास्तविक जीवन के बीच एक मजबूत सेतु बने। उनके अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल सफल परीक्षार्थी बनाना नहीं, बल्कि ऐसे जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है जो जीवन की चुनौतियों का आत्मविश्वास से सामना कर सकें, विवेकपूर्ण निर्णय लें और समाज के विकास में सक्रिय भूमिका निभाएँ।
उन्होंने यह भी कहा कि आज की शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा और रुचियों को पहचानने तथा उन्हें विकसित करने के पहले से कहीं अधिक अवसर प्रदान कर रही है। रोबोटिक्स, संगीत, खेल, रंगमंच, कला और अन्य सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ अब शिक्षा का अभिन्न अंग बन चुकी हैं। ये गतिविधियाँ केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि नेतृत्व क्षमता, रचनात्मक सोच, आत्मविश्वास और व्यक्तित्व विकास की मजबूत आधारशिला हैं।
अकादमिक और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों के बीच संतुलन को सफलता का मूल मंत्र बताते हुए डॉ. गुलाटी ने कहा कि प्रभावी समय प्रबंधन, अनुशासन और संतुलित दिनचर्या प्रत्येक विद्यार्थी के लिए आवश्यक है। पढ़ाई के साथ खेल, शारीरिक गतिविधियों, रचनात्मक अभिरुचियों और पर्याप्त विश्राम को समान महत्व देना चाहिए। उनका स्पष्ट संदेश है कि “जब शिक्षा बौद्धिक विकास के साथ भावनात्मक, शारीरिक और सामाजिक विकास को भी समान महत्व देती है, तभी एक संतुलित, संवेदनशील और सफल व्यक्तित्व का निर्माण होता है।”
डॉ. गुलाटी के विचार वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश हैं कि आने वाले समय की शिक्षा केवल ज्ञान प्रदान करने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि विद्यार्थियों को नवाचारी, जिम्मेदार, नैतिक मूल्यों से युक्त और वैश्विक दृष्टिकोण रखने वाला नागरिक बनाने की दिशा में कार्य करेगी।
डॉ. रागिनी गुलाटी के बारे में

डॉ. रागिनी गुलाटी शिक्षा के क्षेत्र में 35 वर्षों से अधिक का समृद्ध शिक्षण अनुभव तथा 5 वर्षों से अधिक का प्रधानाचार्या के रूप में नेतृत्व अनुभव रखती हैं। उन्होंने इंटरनेशनल इंटर्नशिप यूनिवर्सिटी (IIU) से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की है तथा विभिन्न अंतरराष्ट्रीय शैक्षिक सम्मेलनों और अध्ययन यात्राओं में अपने संस्थान का प्रतिनिधित्व किया है। उनका उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, नैतिक मूल्यों और नवाचार के माध्यम से विद्यार्थियों को आत्मविश्वासी, उत्तरदायी एवं वैश्विक दृष्टिकोण से संपन्न नागरिक बनाना है।


