ब्यूरो प्रतापगढ़।
उत्तर प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र में वंदे मातरम् पर हुई विशेष चर्चा के दौरान जनसत्ता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं कुंडा विधायक कुंवर रघुराज प्रताप सिंह ‘राजा भइया’ का संबोधन केवल भाषण नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति का उद्घोष बनकर सदन में गूंज उठा। उनके ओजस्वी और निर्भीक शब्दों ने यह स्पष्ट कर दिया कि वंदे मातरम् पर राजनीति करना केवल एक विवाद नहीं, बल्कि भारत की आत्मा और स्वतंत्रता संग्राम की विरासत पर सीधा प्रहार है।
राजा भइया ने दो टूक शब्दों में कहा कि वंदे मातरम् किसी दल, मजहब या विचारधारा की बपौती नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है, जिसने गुलामी की जंजीरों को तोड़कर भारत को आज़ादी दिलाई। इस पवित्र उद्घोष पर सवाल उठाना उन वीर शहीदों के बलिदान का अपमान है, जिन्होंने इसी नारे के साथ फांसी के फंदे को चूम लिया।
उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत माता के प्रति समर्पण, त्याग और कर्तव्य का संकल्प है। इस पर मजाक, उपहास या राजनीतिक टिप्पणी राष्ट्र की स्मृतियों को लहूलुहान करने के समान है। ऐसा आचरण लोकतंत्र की मर्यादा को भी ठेस पहुंचाता है।
अपने संबोधन की शुरुआत में राजा भइया ने विधानसभा अध्यक्ष का आभार जताते हुए कहा कि राष्ट्रीय महत्व के विषय पर चर्चा की अनुमति देकर सदन की गरिमा और संवैधानिक परंपराओं को सुदृढ़ किया गया है। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् सत्ता और विपक्ष से ऊपर उठकर पूरे सदन की साझा आत्मा की आवाज़ है।
राजा भइया ने स्पष्ट किया कि वंदे मातरम् किसी धर्म के विरुद्ध नहीं है। भारत की संस्कृति में धरती को मां मानने की परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है। मातृभूमि के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना सनातन सांस्कृतिक चेतना का मूल है और वंदे मातरम् उसी भावना की मुखर अभिव्यक्ति है।
लोकतंत्र की मर्यादा को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि किसी को भी बलपूर्वक वंदे मातरम् गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, लेकिन जनप्रतिनिधियों की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान पर समाज का मार्गदर्शन करें, न कि भ्रम और विभाजन पैदा करें।
उन्होंने तीखा सवाल दागते हुए कहा कि जब संविधान सभा ने सर्वसम्मति से वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया, तो आज उस पर विवाद खड़ा करना किस सोच और किस राजनीतिक एजेंडे का परिणाम है। विधानसभा से उठने वाली आवाज़ देश की एकता को मजबूत करने वाली होनी चाहिए, न कि उसे कमजोर करने वाली।
अपने ऐतिहासिक संबोधन के समापन पर राजा भइया ने आह्वान किया कि वंदे मातरम् को चुनावी हथकंडा या सांप्रदायिक बहस का विषय न बनाकर शहीदों की अमर स्मृति, राष्ट्रीय अस्मिता और अखंड भारत के संकल्प के रूप में देखा जाए। उन्होंने कहा कि जब सदन की कार्यवाही वंदे मातरम् से प्रारंभ होती है, तो वह केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि यह घोषणा होती है कि हम सबकी पहली पहचान भारतीय है और भारत सर्वोपरि है।


