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*सनातन चेतना का विराट उद्घोष:* प्रतापगढ़ में ‘भारत की गौरवशाली परंपरा’ संगोष्ठी बनी सांस्कृतिक पुनर्जागरण का घोषणापत्र

*सनातन चेतना का विराट उद्घोष:* प्रतापगढ़ में ‘भारत की गौरवशाली परंपरा’ संगोष्ठी बनी सांस्कृतिक पुनर्जागरण का घोषणापत्र

बेल्हा पहुंचे पूर्व विधायक उदयभान करवरिया का जगह जगह लोगों ने किया भव्य स्वागत

ब्यूरो प्रतापगढ़। पाश्चात्य प्रभाव, वैचारिक भटकाव और सांस्कृतिक भ्रम के इस दौर में भारतीय सनातन चेतना को पुनः जागृत करने के उद्देश्य से आयोजित “भारत की गौरवशाली परंपरा” विषयक संगोष्ठी शुक्रवार को लीला पैलेस, मीरा भवन चौराहा पर राष्ट्रवादी ओज, वैचारिक स्पष्टता और सांस्कृतिक गर्व के साथ ऐतिहासिक रूप से संपन्न हुई। संगोष्ठी ने दो टूक संदेश दिया कि भारत अपनी सनातन जड़ों से कटकर नहीं, बल्कि उन्हीं के आधार पर विश्वगुरु बनेगा।
कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे पूर्व विधायक उदयभान करवरिया का नगर में जगह-जगह भव्य स्वागत किया गया। अपने ओजस्वी संबोधन में श्री करवरिया ने कहा कि “भारत की सनातन परंपरा को कमजोर करने की साजिशें आज भी जारी हैं, लेकिन यह संस्कृति इतनी विराट है कि न कभी झुकी है और न झुकेगी। सनातन धर्म ने ही मानवता, समानता और राष्ट्रप्रेम का मूल भाव दिया है।”
उन्होंने कहा कि जो लोग भारतीय संस्कृति को पिछड़ा या दकियानूसी बताने का दुस्साहस करते हैं, उन्हें भारत के ज्ञान, विज्ञान और दर्शन के समृद्ध इतिहास का गंभीर अध्ययन करना चाहिए। साथ ही युवाओं से आह्वान किया कि वे संस्कृति-विरोधी विचारधाराओं को पहचानें, उनका वैचारिक प्रतिकार करें और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम ब्राम्हणों को जागृति करने के लिए रखा गया है। सिर्फ ब्राम्हण ही है जो किसी से उसकी जाति पूँछकर उसका कार्य नहीं करता।
मुख्य वक्ता ओम प्रकाश जी, विभाग प्रचारक (आरएसएस) ने कहा कि सनातन संस्कृति ही वह सूत्र है, जिसने भारत को हजारों वर्षों तक एकता में बांधे रखा।
पूर्व राष्ट्रीय मंत्री आलोक कुमार पाण्डेय ने कहा कि “सनातन धर्म कोई संकीर्ण पंथ नहीं, बल्कि एक जीवन पद्धति है। जो इसे नकारता है, वह स्वयं अपने अस्तित्व से कट जाता है।”
कार्यक्रम के आयोजक डॉ. सौरभ पाण्डेय एवं संयोजक ज्योतिषाचार्य आलोक शुक्ल ‘विद्वांश’ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “यह संगोष्ठी केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का संकल्प है। सनातन विचार आज भी समाज की चेतना में जीवंत है और रहेगा।”
आयोजकों ने सभी विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं, बुद्धिजीवियों, सामाजिक संगठनों, मीडिया प्रतिनिधियों एवं नगरवासियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि भविष्य में ऐसे वैचारिक आयोजनों को और व्यापक स्तर पर आयोजित किया जाएगा।
संगोष्ठी के समापन पर सर्वसम्मति से यह निष्कर्ष निकला कि सनातन संस्कृति ही भारत की आत्मा है और उसी से राष्ट्र की दिशा, दशा और भविष्य तय होगा।
कार्यक्रम में हजारों की संख्या में लोग उपस्थित रहे।

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